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पौलुस और उसके साथी

पौलुस

अन्य नाम: शाऊल

प्रेरित और यात्रा करनेवाला प्रचारक, जो शाऊल भी कहलाता है

108
घटनाएँ
60
स्थान
9
यात्राएँ

संपादकीय सारांश

प्रेरितों के काम में उसका परिचय शाऊल नामक एक जवान के रूप में कराया गया है, जो स्तिफनुस की मृत्यु से सहमत था और कलीसिया को तब तक सताता रहा, जब तक दमिश्क के मार्ग पर प्रभु उसे दिखाई न दिया। इसके बाद यह पुस्तक उसकी उन यात्राओं का वर्णन करती है जो अन्ताकिया से आरम्भ होकर एशिया माइनर, मकिदुनिया और यूनान में हुईं, और अन्त में उसे एक बन्दी के रूप में रोम तक ले गईं; प्रेरितों के काम में उसे पहली बार पाफुस में पौलुस कहा गया है।

पवित्रशास्त्र

यात्राएँ

9

इनकी कहानी कहाँ घटित हुई

60

निवासी: तरसुस ()

वचन में उल्लेख

108
  1. स्तिफनुस का भाषण और मृत्यु

    बड़े-बड़े अद्भुत काम करनेवाले स्तिफनुस को पकड़कर महासभा में लाया गया, जहाँ झूठे गवाहों ने उस पर मन्दिर और व्यवस्था के विरोध में बोलने का दोष लगाया। उसने उत्तर में इस्राएल के इतिहास का लम्बा वर्णन किया। क्रोध से भरकर वे उसे नगर के बाहर निकालकर उस पर पथराव करने लगे, और वह प्रार्थना करता रहा; शाऊल उसकी मृत्यु से सहमत था।

  2. सताव से कलीसिया तितर-बितर हुई

    यरूशलेम की कलीसिया पर बड़ा सताव आरम्भ हुआ, और प्रेरितों को छोड़ सब लोग यहूदिया और सामरिया के क्षेत्रों में तितर-बितर हो गए। भक्त पुरुषों ने स्तिफनुस को कब्र में रखा, जबकि शाऊल घर-घर घुसकर पुरुषों और स्त्रियों को घसीटकर बन्दीगृह में डालता था। जो तितर-बितर हुए थे, वे वचन सुनाते हुए फिरे।

  3. दमिश्क के मार्ग पर शाऊल

    शाऊल महायाजक की चिट्ठियाँ लेकर दमिश्क के निकट पहुँच रहा था, ताकि इस पंथ के लोगों को बाँधकर यरूशलेम ले आए; तभी आकाश से उसके चारों ओर ज्योति चमकी, और एक वाणी ने उससे कहा कि बोलनेवाला यीशु है, जिसे वह सता रहा है। देख न पाने की दशा में उसे नगर में ले जाया गया, और तीन दिन तक उसने न कुछ खाया और न पिया।

  4. हनन्याह ने शाऊल पर हाथ रखे

    प्रभु ने दर्शन में दमिश्क के एक चेले हनन्याह को सीधी नामक गली में यहूदा के घर शाऊल के पास भेजा। हनन्याह ने शाऊल की बुराइयों के विषय में सुन रखा था, फिर भी वह गया और उसने उस पर हाथ रखे; शाऊल की आँखों से छिलके जैसा कुछ गिरा, वह फिर देखने लगा और उसने बपतिस्मा लिया।

  5. दमिश्क की शहरपनाह से बच निकलना

    दमिश्क में शाऊल तुरन्त आराधनालयों में यीशु मसीह का प्रचार करने लगा कि वह परमेश्वर का पुत्र है, और वहाँ रहनेवाले यहूदियों का मुँह बन्द करता रहा। बहुत दिन बीतने पर उसे मार डालने की युक्ति रची गई और फाटकों की रात-दिन निगरानी होने लगी, पर उसके चेलों ने उसे टोकरे में बैठाकर शहरपनाह से नीचे उतार दिया।

  6. यरूशलेम में प्रेरितों के साथ शाऊल

    जब शाऊल यरूशलेम आया, तो चेले उससे डरते थे, पर बरनबास ने उसे प्रेरितों के पास ले जाकर बताया कि शाऊल ने मार्ग में किस रीति से प्रभु को देखा था और दमिश्क में कैसे साहस से प्रचार किया था। शाऊल उनके साथ रहकर निडर होकर प्रचार करता और यूनानी भाषा बोलनेवाले यहूदियों से वाद-विवाद करता रहा, जो उसे मार डालने का यत्न कर रहे थे।

  7. शाऊल को तरसुस भेजा गया

    जब भाइयों को पता चला कि यूनानी भाषा बोलनेवाले यहूदी शाऊल को मार डालने का यत्न कर रहे हैं, तो उन्होंने उसे कैसरिया ले जाकर तरसुस भेज दिया।

  8. अन्ताकिया में चेले पहली बार मसीही कहलाए

    यरूशलेम की कलीसिया ने बरनबास को अन्ताकिया भेजा, और उसने विश्वासियों को उपदेश दिया कि वे प्रभु से लिपटे रहें। फिर वह शाऊल को ढूँढ़ने तरसुस गया और उसे अन्ताकिया ले आया, जहाँ वे पूरे एक वर्ष तक बहुत से लोगों को उपदेश देते रहे। चेले सबसे पहले अन्ताकिया में ही मसीही कहलाए।

  9. अगबुस ने अकाल की भविष्यद्वाणी की

    कुछ भविष्यद्वक्ता यरूशलेम से अन्ताकिया आए, और उनमें से अगबुस ने आत्मा की प्रेरणा से बताया कि सारे जगत में बड़ा अकाल पड़ेगा; यह अकाल क्लौदियुस के समय में पड़ा। तब चेलों में से हर एक ने अपनी-अपनी पूँजी के अनुसार यहूदिया में रहनेवाले भाइयों के लिए सहायता भेजी, जो बरनबास और शाऊल के हाथ प्राचीनों के पास पहुँचाई गई।

  10. बरनबास और शाऊल का यूहन्ना मरकुस को साथ लेना

    कुछ हस्तलिपियों के अनुसार बरनबास और शाऊल अपनी सेवा पूरी करके यूहन्ना को, जो मरकुस कहलाता है, साथ लेकर यरूशलेम को लौटे। IRV हिन्दी में यहाँ लिखा है कि वे “यरूशलेम से लौटे”।

  11. बरनबास और शाऊल भेजे गए

    जब अन्ताकिया की कलीसिया के भविष्यद्वक्ता और उपदेशक उपवास सहित प्रभु की उपासना कर रहे थे, तब पवित्र आत्मा ने बरनबास और शाऊल को अलग करने के लिए कहा। उपवास और प्रार्थना के बाद उन्होंने उन पर हाथ रखे और उन्हें विदा किया।

  12. जहाज से साइप्रस की ओर

    बरनबास और शाऊल सिलूकिया को गए और वहाँ से जहाज पर चढ़कर साइप्रस को चले।

  13. सलमीस के आराधनालयों में प्रचार

    सलमीस में उन्होंने यहूदियों के आराधनालयों में परमेश्वर का वचन सुनाया; यूहन्ना सहायक के रूप में उनके साथ था।

  14. हाकिम ने विश्वास किया

    पाफुस में एलीमास जादूगर ने हाकिम सिरगियुस पौलुस को विश्वास से फेरने का प्रयत्न किया। तब शाऊल ने, जिसका नाम पौलुस भी था, घोषणा की कि एलीमास कुछ समय तक अंधा रहेगा, और हाकिम ने विश्वास किया।

  15. यूहन्ना मरकुस यरूशलेम लौट गया

    पौलुस और उसके साथी पाफुस से जहाज द्वारा पंफूलिया के पिरगा में आए, जहाँ यूहन्ना उन्हें छोड़कर यरूशलेम लौट गया।

  16. आराधनालय में पौलुस का उपदेश

    सब्त के दिन बोलने का निमंत्रण मिलने पर पौलुस ने इस्राएल का इतिहास सुनाया और यीशु का प्रचार किया। एक सप्ताह बाद नगर के प्रायः सब लोग इकट्ठे हुए; जब कुछ लोग उनका विरोध करने लगे, तो पौलुस और बरनबास अन्यजातियों की ओर फिरे, और सताव भड़कने पर उन्हें वहाँ से निकाल दिया गया।

  17. बँटा हुआ नगर

    यहूदियों और यूनानियों की एक बड़ी भीड़ ने विश्वास किया, और प्रेरित बहुत दिन तक वहाँ रहे। परन्तु नगर के लोगों में फूट पड़ गई, और जब प्रेरितों पर पथराव करने का प्रयास किया गया, तो वे वहाँ से भाग गए।

  18. लुस्त्रा में चंगाई

    पौलुस ने एक ऐसे मनुष्य को चंगा किया जो कभी चला नहीं था। भीड़ ने बरनबास को ज्यूस और पौलुस को हिर्मेस कहा, और प्रेरितों ने बड़ी कठिनाई से लोगों को बलिदान चढ़ाने से रोका।

  19. पौलुस पर पथराव

    अन्ताकिया और इकुनियुम से आए विरोधियों ने भीड़ को अपनी ओर कर लिया और पौलुस पर पथराव किया, और वे उसे मरा हुआ समझकर नगर के बाहर घसीट ले गए। पर वह उठकर फिर नगर में चला गया।

  20. दिरबे में बहुत से चेले

    पौलुस और बरनबास ने दिरबे में सुसमाचार सुनाया और बहुत से चेले बनाए।

  21. नई कलीसियाओं को स्थिर करना

    लुस्त्रा, इकुनियुम और अन्ताकिया से होते हुए उसी मार्ग से लौटते समय उन्होंने चेलों को विश्वास में बने रहने के लिए उत्साहित किया, और हर एक कलीसिया में प्राचीन ठहराए।

  22. पिरगा में वचन सुनाना

    पिसिदिया से होते हुए पंफूलिया पहुँचकर पौलुस और बरनबास ने पिरगा में वचन सुनाया।

  23. अत्तलिया से जहाज द्वारा वापसी

    पिरगा से वे अत्तलिया को गए और वहाँ से जहाज द्वारा अन्ताकिया लौट आए।

  24. कलीसिया को वृत्तांत सुनाना

    अन्ताकिया लौटकर उन्होंने कलीसिया को इकट्ठा किया और बताया कि परमेश्वर ने किस प्रकार अन्यजातियों के लिए विश्वास का द्वार खोल दिया था। वे वहाँ बहुत दिन तक रहे।

  25. अन्ताकिया में खतने पर विवाद

    यहूदिया से आए कुछ लोगों ने भाइयों को सिखाया कि यदि मूसा की रीति के अनुसार उनका खतना न हो, तो वे उद्धार नहीं पा सकते। बहुत विवाद के बाद यह ठहराया गया कि पौलुस, बरनबास और कुछ अन्य लोग इस प्रश्न को लेकर यरूशलेम में प्रेरितों और प्राचीनों के पास जाएँ।

  26. फीनीके और सामरिया से होकर

    कलीसिया ने पौलुस और बरनबास को विदा किया, और वे फीनीके और सामरिया से होते हुए अन्यजातियों के मन फिराने का समाचार सुनाते गए, जिससे सब भाइयों को बड़ा आनन्द हुआ।

  27. यरूशलेम की सभा

    यरूशलेम में विश्वासी बने कुछ फरीसियों ने कहा कि अन्यजाति विश्वासियों का खतना होना चाहिए और उन्हें मूसा की व्यवस्था माननी चाहिए। पतरस, बरनबास और पौलुस के बोलने के बाद याकूब ने यह निर्णय दिया कि जो अन्यजाति परमेश्वर की ओर फिरते हैं, उन्हें दुःख न दिया जाए; उनसे केवल इतना कहा जाए कि वे कुछ बातों से परे रहें। पत्री लेकर अन्ताकिया जाने के लिए यहूदा, जो बरसब्बास कहलाता है, और सीलास चुने गए।

  28. अन्ताकिया में पत्री का सौंपा जाना

    अन्ताकिया में संदेशवाहकों ने विश्वासियों को इकट्ठा करके पत्री सौंप दी, और विश्वासी उसके प्रोत्साहन से आनन्दित हुए। यहूदा और सीलास ने, जो भविष्यद्वक्ता थे, भाइयों को प्रोत्साहित करके स्थिर किया, और कुछ समय बाद वे शान्ति के साथ लौटने के लिए विदा किए गए; पर पौलुस और बरनबास अन्ताकिया में ही रहकर प्रभु के वचन का उपदेश देते और प्रचार करते रहे।

  29. पौलुस और बरनबास अलग हुए

    पौलुस ने सुझाव दिया कि जिन-जिन नगरों में उन्होंने प्रचार किया था, उन सब में फिर से जाएँ। यूहन्ना मरकुस को साथ ले जाने के विषय में ऐसा तीखा विवाद हुआ कि बरनबास मरकुस को लेकर जहाज से साइप्रस चला गया, जबकि पौलुस सीलास को चुनकर सीरिया और किलिकिया से होता हुआ गया।

  30. फिर दिरबे और लुस्त्रा में

    पौलुस फिर दिरबे और लुस्त्रा में आया, और उसने पहली यात्रा में स्थापित हुई कलीसियाओं से दोबारा भेंट की।

  31. तीमुथियुस पौलुस के साथ हो लिया

    तीमुथियुस नामक एक चेला, जिसकी लुस्त्रा और इकुनियुम के विश्वासियों में अच्छी साख थी, पौलुस के साथ हो लिया। नगर-नगर जाते हुए वे प्रेरितों और प्राचीनों के ठहराए हुए निर्णय पहुँचाते गए, और कलीसियाएँ प्रतिदिन बढ़ती गईं।

  32. मकिदुनी पुरुष का दर्शन

    आत्मा ने यात्रियों को आसिया में वचन सुनाने से और बितूनिया में जाने से रोक दिया; तब वे त्रोआस में आए। वहाँ पौलुस ने दर्शन में एक मकिदुनी पुरुष को देखा, जो उससे आकर सहायता करने की विनती कर रहा था; और यात्री तुरन्त चल पड़े।

  33. सीधे सुमात्राके की ओर

    त्रोआस से जहाज खोलकर वे सीधे सुमात्राके को गए।

  34. नियापुलिस में उतरना

    दूसरे दिन वे नियापुलिस पहुँचे, और वहाँ से फिलिप्पी को गए।

  35. लुदिया का बपतिस्मा

    सब्त के दिन नगर के बाहर नदी किनारे के प्रार्थना-स्थल पर थुआतीरा की बैंगनी कपड़े बेचनेवाली लुदिया ने पौलुस की बातें सुनीं। उसने अपने घराने समेत बपतिस्मा लिया, और यात्रियों को मनाकर अपने घर में ठहराया।

  36. बन्दीगृह, भूकम्प और दरोगा

    जब पौलुस ने एक दासी में से भावी कहनेवाली आत्मा निकाली, तो उसके स्वामी पौलुस और सीलास को हाकिमों के सामने घसीट ले गए, जिन्होंने उन्हें पिटवाकर बन्दीगृह में डलवा दिया। आधी रात को जब वे प्रार्थना कर रहे थे और भजन गा रहे थे, तब एक भूकम्प से द्वार खुल गए; दरोगा और उसके सारे घराने ने बपतिस्मा लिया, और परमेश्वर पर विश्वास करके उसने अपने घराने के साथ आनन्द मनाया।

  37. अम्फिपुलिस और अपुल्लोनिया से होकर

    फिलिप्पी से निकलकर पौलुस और सीलास थिस्सलुनीके जाते हुए अम्फिपुलिस और अपुल्लोनिया से होकर गए।

  38. थिस्सलुनीके में हुल्लड़

    पौलुस तीन सब्त के दिन आराधनालय में पवित्रशास्त्र से वाद-विवाद करता रहा, और बहुतों ने उसकी बात मान ली। विरोधियों ने भीड़ इकट्ठी करके नगर में हुल्लड़ मचाया, और वे यासोन को नगर के हाकिमों के सामने घसीट ले गए।

  39. बिरीया के लोगों ने पवित्रशास्त्र को जाँचा

    बिरीया के आराधनालय के यहूदियों ने बड़ी लालसा से वचन ग्रहण किया और वे प्रतिदिन पवित्रशास्त्र को जाँचते रहे; उनमें से बहुतों ने विश्वास किया, और उनके साथ कुलीन यूनानी स्त्रियों और पुरुषों ने भी। जब थिस्सलुनीके से विरोधी आए, तो विश्वासियों ने पौलुस को समुद्र की ओर विदा कर दिया, परन्तु सीलास और तीमुथियुस वहीं रहे।

  40. अरियुपगुस पर पौलुस

    नगर की मूरतों से व्याकुल होकर पौलुस ने आराधनालय में और चौक में वाद-विवाद किया। जब उसे अरियुपगुस पर ले जाया गया, तो उसने अनजाने ईश्वर की एक वेदी के विषय में बात की; कुछ लोगों ने उपहास किया, परन्तु दियुनुसियुस, दमरिस और कुछ अन्य लोगों ने विश्वास किया।

  41. कुरिन्थुस में डेढ़ वर्ष

    पौलुस अक्विला और प्रिस्किल्ला के साथ रहकर तम्बू बनाने का काम करता था। जब सीलास और तीमुथियुस मकिदुनिया से आ गए और आराधनालय के लोग उसका विरोध करने लगे, तो वह आराधनालय छोड़कर उससे लगे हुए यूस्तुस के घर में चला गया। क्रिस्पुस ने अपने घराने समेत विश्वास किया, और रात को एक दर्शन पाने के बाद पौलुस डेढ़ वर्ष तक वहीं रहकर उपदेश देता रहा।

  42. गल्लियो के न्याय आसन के सामने

    विरोधी पौलुस को अखाया के राज्यपाल गल्लियो के सामने ले आए, जिसने उनकी अपनी व्यवस्था से जुड़े प्रश्नों का न्याय करने से इन्कार कर दिया और उन्हें न्याय आसन के सामने से निकलवा दिया। तब सोस्थिनेस को न्याय आसन के सामने ही पीटा गया।

  43. किंख्रिया में मन्नत

    पौलुस प्रिस्किल्ला और अक्विला के साथ किंख्रिया से जहाज द्वारा सीरिया को रवाना हुआ। प्रेरितों के काम में यह भी लिखा है कि उसने “किंख्रिया में इसलिए सिर मुँड़ाया, क्योंकि उसने मन्नत मानी थी”। अधिकतर पाठक मानते हैं कि सिर मुँड़ानेवाला पौलुस था; कुछ मानते हैं कि वह अक्विला था।

  44. इफिसुस की पहली संक्षिप्त यात्रा

    पौलुस ने प्रिस्किल्ला और अक्विला को इफिसुस में छोड़ा और आराधनालय में वाद-विवाद किया। जब उससे और कुछ समय रुकने को कहा गया, तो उसने मना कर दिया, परन्तु वचन दिया कि यदि परमेश्वर चाहे तो वह लौटकर आएगा।

  45. कलीसिया को नमस्कार

    कैसरिया से ऊपर जाकर पौलुस ने कलीसिया को नमस्कार किया; इसके बाद वह अन्ताकिया को गया।

  46. कैसरिया में उतरना

    इफिसुस से जलयात्रा करके पौलुस कैसरिया में उतरा।

  47. अन्ताकिया को वापसी

    पौलुस अन्ताकिया को गया और फिर से यात्रा पर निकलने से पहले कुछ समय वहीं रहा।

  48. फिर यात्रा पर

    पौलुस अन्ताकिया से चल पड़ा और क्रम से गलातिया और फ्रूगिया के क्षेत्र में से होता हुआ सब चेलों को स्थिर करता गया।

  49. इफिसुस में लगभग बारह चेले

    पौलुस को लगभग बारह चेले मिले, जो केवल यूहन्ना का बपतिस्मा जानते थे। उन्होंने प्रभु यीशु के नाम का बपतिस्मा लिया, और जब पौलुस ने उन पर हाथ रखे, तो उन पर पवित्र आत्मा उतरा।

  50. तुरन्नुस की पाठशाला में दो वर्ष

    आराधनालय में तीन महीने बिताने के बाद पौलुस दो वर्ष तक प्रतिदिन तुरन्नुस की पाठशाला में उपदेश देता रहा, यहाँ तक कि आसिया के सब रहनेवालों ने वचन सुन लिया। जादू-टोना करनेवालों में से बहुतों ने अपनी पुस्तकें सबके सामने जला दीं।

  51. तीमुथियुस और इरास्तुस का मकिदुनिया भेजा जाना

    पौलुस ने आत्मा में ठाना कि मकिदुनिया और अखाया से होकर यरूशलेम जाए, और कहा कि उसके बाद उसे रोम को भी देखना अवश्य है। उसने अपनी सेवा करनेवालों में से दो को, अर्थात् तीमुथियुस और इरास्तुस को, मकिदुनिया भेजा, और वह स्वयं कुछ समय तक आसिया में रहा।

  52. सुनारों का बलवा

    दिमेत्रियुस नामक एक सुनार ने, जो अरतिमिस के चाँदी के मन्दिर बनाता था, कारीगरों को पौलुस के विरुद्ध भड़काया। सारे नगर में कोलाहल मच गया, और भीड़ पौलुस के मकिदुनी संगी यात्री गयुस और अरिस्तर्खुस को पकड़कर रंगशाला में दौड़ पड़ी। लोग लगभग दो घंटे तक चिल्लाते रहे; फिर नगर के मंत्री ने उन्हें शान्त किया।

  53. मकिदुनिया की कलीसियाओं को प्रोत्साहन

    हुल्लड़ थम जाने के बाद पौलुस इफिसुस से मकिदुनिया को चला, और मार्ग में बहुत सी बातों से विश्वासियों को उत्साहित करता गया।

  54. यूनान में तीन महीने

    पौलुस ने यूनान में तीन महीने बिताए। जब वह जहाज से सीरिया जाने ही वाला था, तब उसके विरुद्ध षड्यंत्र रचा गया, इसलिए उसने मकिदुनिया होकर लौटने का निश्चय किया।

  55. फिलिप्पी से जलयात्रा

    पौलुस जहाज से सीरिया जाने ही वाला था कि उसके विरुद्ध षड्यंत्र रचा गया, इसलिए वह मकिदुनिया होकर लौटा। अख़मीरी रोटी के दिनों के बाद पौलुस और वृत्तांत का वर्णनकर्ता फिलिप्पी से जहाज पर चढ़े और पाँच दिन में त्रोआस पहुँचे।

  56. त्रोआस में प्रतीक्षा करते साथी

    प्रेरितों के काम में उन लोगों के नाम दिए गए हैं, जो आसिया तक पौलुस के साथ गए: बिरीया का सोपत्रुस, थिस्सलुनीकियों में से अरिस्तर्खुस और सिकुन्दुस, दिरबे का गयुस, तीमुथियुस, और आसिया के तुखिकुस और त्रुफिमुस। ये लोग आगे जाकर त्रोआस में प्रतीक्षा कर रहे थे; वहाँ पौलुस का दल उनसे आ मिला और सात दिन तक वहीं रहा।

  57. यूतुखुस का खिड़की से गिरना

    जब पौलुस आधी रात तक बातें करता रहा, तब यूतुखुस नाम के एक जवान को नींद आ गई; वह तीसरी मंज़िल से गिर पड़ा और मरा हुआ उठाया गया। पौलुस ने उसे गले लगाया, और वह जवान जीवित भीतर लाया गया।

  58. थल मार्ग से अस्सुस तक

    दूसरे लोग जहाज से आगे चले गए, पर पौलुस ने थल मार्ग से जाना चुना; वह अस्सुस में उनसे आ मिला, और उन्होंने उसे जहाज पर चढ़ा लिया।

  59. मितुलेने में पड़ाव

    पौलुस को लेकर जहाज मितुलेने पहुँचा।

  60. खियुस के सामने

    अगले दिन जहाज खियुस के सामने पहुँचा।

  61. सामुस में संक्षिप्त पड़ाव

    उसके अगले दिन जहाज सामुस में जा लगा।

  62. त्रोगुल्लियुम में ठहराव

    कुछ प्राचीन हस्तलिपियों के अनुसार जहाज मीलेतुस जाने से पहले त्रोगुल्लियुम में ठहरा था। IRV हिन्दी पाठ में त्रोगुल्लियुम का उल्लेख नहीं है।

  63. इफिसुस के प्राचीनों से विदाई

    पिन्तेकुस्त तक यरूशलेम पहुँचने की जल्दी में पौलुस ने इफिसुस के प्राचीनों को बुलवा भेजा। उसने उन्हें अपनी सेवकाई की याद दिलाई, उन्हें चेतावनी दी और उनका उत्साह बढ़ाया। फिर वे सब रोए और उन्होंने मिलकर प्रार्थना की, और इसके बाद वह जहाज पर चढ़ गया।

  64. सीधे मार्ग से कोस तक

    मीलेतुस से निकलकर जहाज सीधे मार्ग से कोस पहुँचा।

  65. रुदुस पहुँचना

    अगले दिन जहाज रुदुस पहुँचा।

  66. फीनीके जानेवाला जहाज

    पतरा में उन्हें समुद्र पार फीनीके जानेवाला एक जहाज मिला, और वे उस पर सवार हो गए।

  67. सोर में सात दिन

    साइप्रस को बाएँ हाथ छोड़ते हुए जहाज माल उतारने के लिए सोर में लगा। यात्री वहाँ के चेलों के साथ सात दिन रहे। इन चेलों ने पौलुस से आग्रह किया कि वह यरूशलेम न जाए; फिर समुद्र के किनारे प्रार्थना करके वे एक दूसरे से विदा हुए।

  68. पतुलिमयिस में एक दिन

    सोर से जलयात्रा पूरी करके वे पतुलिमयिस पहुँचे और वहाँ के विश्वासियों को नमस्कार करके एक दिन वहीं रहे।

  69. अगबुस की चेतावनी

    पौलुस का दल फिलिप्पुस सुसमाचार प्रचारक के यहाँ ठहरा। भविष्यद्वक्ता अगबुस ने पौलुस के कमरबन्द से अपने ही हाथ-पाँव बाँधे और कहा कि इस कमरबन्द का स्वामी यरूशलेम में बाँधा जाएगा; पौलुस ने उत्तर दिया कि वह वहाँ प्रभु यीशु के नाम के लिए मरने को तैयार है।

  70. यरूशलेम में आगमन

    कैसरिया के कुछ चेले यात्रियों के साथ यरूशलेम गए। वे साइप्रस के मनासोन को साथ ले आए, जो एक पुराना चेला था और जिसके यहाँ उन्हें ठहरना था। यरूशलेम में विश्वासियों ने आनन्द से उनका स्वागत किया।

  71. पौलुस का याकूब और प्राचीनों को समाचार सुनाना

    दूसरे दिन पौलुस ने याकूब और सब प्राचीनों को बताया कि परमेश्वर ने अन्यजातियों में क्या-क्या किया था। व्यवस्था के लिए उत्साही विश्वासियों ने सुना था कि पौलुस अन्यजातियों में रहनेवाले यहूदियों को मूसा से फिर जाने की शिक्षा देता है, इसलिए याकूब और प्राचीनों ने उससे आग्रह किया कि वह मन्नत माने हुए चार पुरुषों के साथ अपने आप को शुद्ध करे; और वह उनके साथ मन्दिर में गया।

  72. मन्दिर में पौलुस का पकड़ा जाना

    जब सात दिन पूरे होने पर थे, तब आसिया के यहूदियों ने पौलुस को मन्दिर में देखकर भीड़ को भड़काया और दावा किया कि वह यूनानियों को मन्दिर में ले आया है, क्योंकि उन्होंने इफिसुस के रहनेवाले त्रुफिमुस को उसके साथ नगर में देखा था। भीड़ पौलुस को मार डालने के लिए बाहर घसीट ले गई, परन्तु सैन्य-दल के सरदार ने सिपाहियों के साथ आकर उसे पकड़ लिया।

  73. सीढ़ी पर पौलुस का प्रत्युत्तर

    सैन्य-दल के सरदार की अनुमति से पौलुस ने इब्रानी भाषा में भीड़ से बातें कीं, और बताया कि वह किस प्रकार इस पंथ को सताता था, जब तक कि दमिश्क के निकट यीशु ने उससे बातें नहीं कीं। जब उसने अन्यजातियों के पास भेजे जाने की बात कही, तो भीड़ उसकी मृत्यु की माँग करने लगी। जब उसे कोड़े मारे जाने वाले थे, तब उसने कहा कि वह रोमी है, और उसे जाँचनेवाले पीछे हट गए।

  74. महासभा के सामने पौलुस

    सैन्य-दल के सरदार ने पौलुस को प्रधान याजकों और महासभा के सामने खड़ा किया, और हनन्याह महायाजक ने उसके मुँह पर थप्पड़ मारने की आज्ञा दी। जब पौलुस ने पुकारकर कहा कि वह फरीसी है और मरे हुओं के पुनरुत्थान के विषय में उसका मुकद्दमा हो रहा है, तो फरीसियों और सदूकियों में झगड़ा होने लगा, और सिपाही उसे जबरदस्ती गढ़ में वापस ले गए।

  75. प्रभु का पौलुस के पास आ खड़ा होना

    उसी रात प्रभु ने पौलुस के पास खड़े होकर उससे कहा कि वह धैर्य रखे: जैसे उसने यरूशलेम में गवाही दी है, वैसे ही उसे रोम में भी गवाही देनी होगी।

  76. षड्यंत्र और पौलुस का भांजा

    चालीस से अधिक लोगों ने शपथ खाई कि जब तक वे पौलुस को मार न डालें, तब तक न कुछ खाएँगे न पीएँगे, और उन्होंने घात लगाने की योजना बनाई। पौलुस के भांजे ने यह सुनकर पहले पौलुस को और फिर सैन्य-दल के सरदार को बताया। सरदार ने सिपाहियों के एक बड़े दल को आज्ञा दी कि रात को ही पौलुस को फेलिक्स राज्यपाल के पास पहुँचा दें, और इस मामले के विषय में फेलिक्स को एक चिट्ठी लिखी।

  77. रातों-रात अन्तिपत्रिस को

    आज्ञा के अनुसार सिपाही पौलुस को रातों-रात अन्तिपत्रिस ले आए। दूसरे दिन वे सवारों को उसके साथ आगे जाने के लिए छोड़कर गढ़ को लौट गए।

  78. कैसरिया में फेलिक्स के हवाले

    सवारों ने कैसरिया पहुँचकर राज्यपाल को चिट्ठी दी और पौलुस को उसके सामने खड़ा किया। जब फेलिक्स को पता चला कि पौलुस किलिकिया का है, तो उसने कहा कि पौलुस पर दोष लगानेवालों के आने पर वह उसकी सुनवाई करेगा, और उसे हेरोदेस के किले में रखने की आज्ञा दी।

  79. फेलिक्स के सामने मुकद्दमा

    हनन्याह महायाजक कुछ प्राचीनों और तिरतुल्लुस नाम के एक वकील के साथ आया, और तिरतुल्लुस ने फेलिक्स के सामने पौलुस पर बलवा भड़काने और मन्दिर को अशुद्ध करने का यत्न करने का दोष लगाया। पौलुस ने उत्तर दिया कि वह यरूशलेम में आराधना करने और अपने लोगों के लिए दान लाने गया था। फेलिक्स ने मुकद्दमे को टाल दिया और पौलुस को पहरे में रखा।

  80. फेलिक्स और द्रुसिल्ला का पौलुस की बातें सुनना

    फेलिक्स अपनी पत्नी द्रुसिल्ला के साथ, जो यहूदी थी, आया और उसने पौलुस से मसीह यीशु पर विश्वास के विषय में सुना; पर जब पौलुस धार्मिकता, संयम और आनेवाले न्याय की चर्चा करने लगा, तो फेलिक्स ने भयभीत होकर उसे विदा कर दिया। धन पाने की आशा में फेलिक्स बार-बार उससे बातें करता रहा, और जब दो वर्ष बाद फेस्तुस उसकी जगह आया, तो फेलिक्स पौलुस को बन्दी ही छोड़ गया।

  81. पौलुस का कैसर की दुहाई देना

    कैसरिया में यरूशलेम से आए यहूदियों ने पौलुस पर बहुत से गम्भीर दोष लगाए, जिनका वे प्रमाण नहीं दे सके, और पौलुस ने कहा कि उसने न व्यवस्था के, न मन्दिर के और न कैसर के विरुद्ध कोई अपराध किया है। जब फेस्तुस ने पूछा कि क्या वह अपने मुकद्दमे के लिए यरूशलेम जाना चाहता है, तो पौलुस ने कैसर की दुहाई दी, और फेस्तुस ने कहा कि वह कैसर ही के पास जाएगा।

  82. अग्रिप्पा और बिरनीके के सामने पौलुस

    राजा अग्रिप्पा और बिरनीके कैसरिया आए, और फेस्तुस ने पौलुस को उनके सामने लाने की आज्ञा दी। पौलुस ने अपने पहले के जीवन का, विश्वासियों को सताने का और दमिश्क के मार्ग पर हुए दर्शन का वर्णन किया। बाद में वे इस बात पर सहमत हुए कि उसने मृत्यु-दण्ड या बन्धन के योग्य कुछ नहीं किया है, और अग्रिप्पा ने कहा कि यदि उसने कैसर की दुहाई न दी होती, तो वह छूट सकता था।

  83. सूबेदार यूलियुस के हवाले

    जब यह निश्चित हुआ कि वे जहाज से इतालिया जाएँ, तो पौलुस और कुछ अन्य बन्दियों को यूलियुस नामक एक सूबेदार के हाथ सौंप दिया गया, और वे अद्रमुत्तियुम के एक जहाज पर चढ़कर समुद्र में निकल पड़े।

  84. सीदोन में मित्रों से भेंट

    सीदोन में यूलियुस ने पौलुस के साथ कृपा का व्यवहार किया और उसे उसके मित्रों के पास जाने दिया, ताकि वे उसकी देखभाल करें।

  85. मूरा में सिकन्दरिया का जहाज

    हवा विपरीत होने के कारण वे साइप्रस की आड़ में होकर चले और लूसिया के मूरा में पहुँचे। वहाँ सूबेदार ने उन्हें इतालिया जानेवाले सिकन्दरिया के एक जहाज पर चढ़ा दिया।

  86. कनिदुस के पास धीमी यात्रा

    बहुत दिनों तक धीरे-धीरे चलने के बाद वे कठिनाई से कनिदुस के सामने पहुँचे; हवा उन्हें आगे बढ़ने नहीं दे रही थी।

  87. क्रेते की आड़ में

    वे सलमोने के सामने से होकर क्रेते की आड़ में चले।

  88. शुभलंगरबारी में पौलुस की चेतावनी

    जलयात्रा पहले ही जोखिम भरी हो चुकी थी, क्योंकि उपवास के दिन बीत गए थे। पौलुस ने चेतावनी दी कि इस यात्रा में माल, जहाज और उनके प्राणों की हानि होगी, परन्तु सूबेदार ने पौलुस की नहीं, जहाज के कप्तान की बात मानी, और वे फीनिक्स में जाड़ा बिताने की आशा से चल पड़े।

  89. आँधी की चपेट में

    यूरकुलीन कहलानेवाली एक प्रचण्ड आँधी जहाज को बहा ले चली। कौदा नामक छोटे टापू की आड़ में मल्लाहों ने जहाज की डोंगी को सुरक्षित किया और रस्सों से जहाज के ढाँचे को कसकर बाँधा, क्योंकि उन्हें सुरतिस के रेत में फँस जाने का डर था।

  90. चौदह दिन तक भटकता जहाज

    बहुत दिनों तक न सूर्य दिखाई दिया, न तारे, और सबने आशा छोड़ दी। पौलुस ने जहाज पर सवार लोगों से कहा कि एक स्वर्गदूत ने उसे भरोसा दिलाया है कि किसी के प्राण की हानि न होगी। चौदहवीं रात वे किनारे के निकट पहुँचे; पौलुस ने सब से भोजन करने का आग्रह किया, और उन्होंने ढाढ़स बाँधा।

  91. जहाज का टूटना

    दिन निकलने पर वे जहाज को एक तट की ओर ले चले, परन्तु जहाज उस जगह जा फँसा जहाँ दो समुद्र मिलते थे; उसका अगला भाग धँसकर अटक गया और पिछला भाग टूटने लगा। सूबेदार ने सिपाहियों को बन्दियों की हत्या करने से रोका, और जहाज पर सवार सभी 276 लोग सुरक्षित बचकर किनारे पहुँच गए।

  92. साँप का लिपटना और पुबलियुस के पिता की चंगाई

    टापू के निवासियों ने अनोखी कृपा दिखाई। एक विषैला साँप पौलुस के हाथ से लिपट गया, फिर भी उसे कोई हानि नहीं हुई। पौलुस ने टापू के प्रधान पुबलियुस के पिता को चंगा किया। तीन महीने बाद यात्री फिर जहाज से रवाना हुए।

  93. सुरकूसा में तीन दिन

    वे सिकन्दरिया के एक जहाज पर चल निकले, जिसने उस टापू पर जाड़ा बिताया था, और सुरकूसा में तीन दिन ठहरे।

  94. रेगियुम में हवा की प्रतीक्षा

    वे घूमकर रेगियुम पहुँचे; एक दिन बाद दक्षिणी हवा चलने लगी।

  95. पुतियुली के विश्वासी

    पुतियुली में उन्हें विश्वासी भाई मिले, और वे सात दिन उनके साथ रहे। फिर वे रोम की ओर चल पड़े।

  96. रोम के मार्ग पर स्वागत

    उनके आने का समाचार सुनकर रोम के विश्वासी भाई अप्पियुस के चौक और तीन-सराय तक उनसे भेंट करने निकल आए। उन्हें देखकर पौलुस ने परमेश्वर का धन्यवाद किया और ढाढ़स बाँधा।

  97. रोम में दो वर्ष

    पौलुस को एक सिपाही की रखवाली में अकेले रहने की आज्ञा मिली। उसने यहूदियों के प्रमुख लोगों से भेंट की, और पूरे दो वर्ष तक अपने किराये के घर में रहा, जहाँ वह अपने पास आनेवाले सब लोगों से मिलता और बिना रोक-टोक निडर होकर उपदेश देता रहा।

  98. तीमुथियुस का कुरिन्थुस भेजा जाना

    कुरिन्थुस की कलीसिया को लिखते हुए पौलुस ने कहा कि उसने तीमुथियुस को, जो प्रभु में उसका प्रिय और विश्वासयोग्य पुत्र है, उनके पास भेजा है। तीमुथियुस उन्हें मसीह में पौलुस के चाल-चलन की याद दिलाएगा, जैसा पौलुस हर जगह हर एक कलीसिया में सिखाता है।

  99. तीतुस का मकिदुनिया में पौलुस के पास पहुँचना

    जब पौलुस मकिदुनिया में आया, तो उसे चैन नहीं मिला; बाहर लड़ाइयाँ थीं और भीतर भय था। परमेश्वर ने तीतुस के आने से उसे शान्ति दी, और तीतुस ने उसे कुरिन्थियों की लालसा, उनके शोक और पौलुस के लिए उनकी धुन का समाचार सुनाया।

  100. अरब जाना और दमिश्क लौटना

    गलातियों को लिखी अपनी पत्री में पौलुस लिखता है कि जब परमेश्वर ने उसमें अपने पुत्र को प्रगट किया, तब उसने न तो तुरन्त किसी से सलाह ली और न यरूशलेम को प्रेरितों के पास गया, परन्तु अरब को चला गया और फिर दमिश्क लौट आया।

  101. पतरस के साथ पन्द्रह दिन

    पौलुस लिखता है कि तीन वर्ष बाद वह कैफा अर्थात् पतरस से भेंट करने यरूशलेम गया और उसके साथ पन्द्रह दिन रहा; प्रभु के भाई याकूब को छोड़ वह और किसी प्रेरित से नहीं मिला। वह यह भी कहता है कि परमेश्वर के सामने वह झूठ नहीं बोल रहा।

  102. सीरिया और किलिकिया के क्षेत्रों में

    पौलुस लिखता है कि इसके बाद वह सीरिया और किलिकिया के क्षेत्रों में आया। यहूदिया की कलीसियाएँ तब भी उसे चेहरे से नहीं पहचानती थीं; उन्होंने केवल यह सुना था कि जो पहले उन्हें सताता था, वह अब उसी विश्वास का प्रचार करता है जिसे वह कभी नाश करने का यत्न करता था, और उन्होंने परमेश्वर की महिमा की।

  103. तीतुस का यरूशलेम जाना

    चौदह वर्ष के बाद पौलुस ईश्वरीय प्रकाश के अनुसार बरनबास के साथ फिर यरूशलेम गया और तीतुस को भी साथ ले गया। जिस सुसमाचार का प्रचार वह अन्यजातियों में करता था, उसे उसने एकान्त में उन लोगों के सामने रखा जो प्रतिष्ठित समझे जाते थे। तीतुस, जो यूनानी था, खतना कराने के लिए विवश नहीं किया गया।

  104. पौलुस तीमुथियुस को फिलिप्पी भेजने की आशा रखता है

    पौलुस और तीमुथियुस ने मिलकर फिलिप्पी के पवित्र लोगों को पत्री लिखी। पौलुस ने उन्हें बताया कि उसे आशा है कि यह पता चलते ही कि उसकी अपनी क्या दशा होगी, वह तीमुथियुस को शीघ्र उनके पास भेज देगा, क्योंकि तीमुथियुस ने सुसमाचार के फैलाने में उसके साथ ऐसे सेवा की थी, जैसे पुत्र पिता की सेवा करता है।

  105. तीमुथियुस का थिस्सलुनीके भेजा जाना

    पौलुस ने थिस्सलुनीकियों को लिखा कि जब और सहा न गया, तो “हमने यह ठहराया कि एथेंस में अकेले रह जाएँ”, और तीमुथियुस को उनके पास भेजा, कि वह क्लेशों के बीच उन्हें स्थिर करे और उनके विश्वास के विषय में उन्हें ढाढ़स दे। अब तीमुथियुस उनके विश्वास और प्रेम का शुभ समाचार लेकर लौट आया था।

  106. केवल लूका पौलुस के साथ

    पौलुस ने तीमुथियुस से आग्रह किया कि वह शीघ्र उसके पास आए: देमास उसे छोड़कर थिस्सलुनीके चला गया है, क्रेसकेंस गलातिया को और तीतुस दलमतिया को चला गया है, और केवल लूका उसके साथ है। उसने तीमुथियुस से कहा कि वह मरकुस को साथ ले आए, क्योंकि सेवा के लिए मरकुस उसके बहुत काम का है।

  107. त्रुफिमुस का मीलेतुस में बीमार छोड़ा जाना

    पौलुस ने तीमुथियुस को बताया कि उसने त्रुफिमुस को मीलेतुस में बीमार छोड़ा है।

  108. तीतुस का क्रेते में छोड़ा जाना

    पौलुस ने तीतुस को लिखा कि उसने उसे क्रेते में इसलिए छोड़ा था कि जो बातें अधूरी रह गई थीं उन्हें वह सुधारे, और पौलुस की आज्ञा के अनुसार नगर-नगर प्राचीनों को नियुक्त करे।

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